Imran Pratapgarhi Shayari

Imran Pratapgarhi Shayari

Imran Pratapgarhi Shayari: एक मशहूर शायर हैं, जिनकी शायरी दिल को छू जाती है। उनकी लिखी हुई लाइनें सिर्फ मोहब्बत तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि समाज की सच्चाई, दर्द और इंसाफ की बात भी करती हैं। उनकी शायरी में एक अलग ही जुनून और सच्चाई देखने को मिलती है।

अंत में, यह कहा जा सकता है कि इमरान प्रतापगढ़ी की शायरी सिर्फ अल्फाज़ नहीं है, बल्कि वह एक एहसास है। उनकी शायरी हमें मोहब्बत, दर्द और समाज के प्रति जागरूक बनाती है। अगर आप दिल से जुड़ी शायरी पढ़ना पसंद करते हैं, तो उनकी शायरी जरूर पढ़ें।

Imran Pratapgarhi Shayari

Imran Pratapgarhi Shayari

कल रात मेरी आँख ये कहते हुई रोई,
बर्मा के मुसलमानों की आवाज़ सुने कोई,

इमरान प्रतापगढ़ी शायरी हिंदी में

ज़माने पर भरोसा करने वालों.
भरोसे का ज़माना जा रहा है !

Imran Pratapgarhi Shayari Love

अपनी मोहब्बत का यो बस एक ही उसूल है.
तू कुबूल है और तेरा सबकुछ कुबूल है।

हाथों की लकीरें पढ कर रो देता है दिल
सब कुछ तो है मगर एक तेरा नाम क्यूँ नहीं है…

ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझ,
हम अपने शहर में होते तो घर गए होते!

Imran Pratapgarhi Shayari Love

जो हम भी उस से जमाने की तरह मिल लेते,
हमारे शामो – ओ शहर भी संवर गए होते!

सुकूने -दिल को न इस तरह से तरसते हम,
तेरे करम से जो बच कर गुजर गए होते!

हमें भी दुख तो बहुत है मगर ये झूठ नहीं,
भुला न देते उसे हम तो मर गए होते!

हमीं ने जख्मे -दिलो-जां छुपा लिए वरना,
न जाने कितनों के चेहरे उतर गए होते!

ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझ,
हम अपने शहर में होते तो घर गए होते!

हवा कुछ ऐसी चली है बिखर गए होते,
रगों में खून न होता तो मर गए होते!

हमने सीखा है ये रसूलों से,
जंग लड़ना सदा उसूलों से !
नफरतों वाली गालियाँ तुम दो,
हम तो देंगे ज़वाब फूलों से !!

तेरे चेहरे में ऐसा क्या है आख़िर,
जिसे बरसों से देखा जा रहा है !!!

अब ना मैं हूँ ना बाकी हैं ज़माने मेरे
फिर भी मशहूर हैं शहरों में फ़साने मेरे,
जिन्दगी है तो नए ज़ख्म भी लग जाएंगे.
अब भी बाकी हैं कई दोस्त पुराने मेरे ।

हवा कुछ ऐसी चली है बिखर गए होते,
रगों में खून न होता तो मर गए होते!

इमरान प्रतापगढ़ी शायरी हिंदी में

हाथों की लकीरें पढ कर रो देता है,
दिल सब कुछ तो है मगर एक तेरा नाम क्यूँ नहीं है…

जो हम भी उस से जमाने की तरह मिल लेते,
हमारे शामो – ओ शहर भी संवर गए होते!

सुकूने-दिल को न इस तरह से तरसते हम,
तेरे करम से जो बच कर गुजर गए होते!

हमें भी दुख तो बहुत है मगर ये झूठ नहीं,
भुला न देते उसे हम तो मर गए होते!

हमीं ने जख्मे-दिलो-जां छुपा लिए वरना
न जाने कितनों के चेहरे उतर गए होते!

तेरे चेहरे में ऐसा क्या है आख़िर,
जिसे बरसों से देखा जा रहा है !!!

एक बुरा दौर आया है टल जाएगा,
वक़्त का क्या है एक दिन बदल जाएमा !

अपनी मोहब्बत का यो बस एक ही उसूल है,
तू कुबूल है और तेरा सबकुछ कुबूल है।

अपनी सांसो में आबाद रखना मुझे,
में रहू ना रहू याद रखना मुझे…..!!

अपनी मोहब्बत का यो बस एक ही उसूल है,
तू कुबूल है और तेरा सबकुछ कुबूल है।

Adhure Alfaaz :


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