Allama Iqbal Shayari: आज हम आपके लिए लेकर आए हैं उर्दू और हिंदी शायर अल्लामा इक़बाल की कुछ चुनिंदा शायरी (Allama Iqbal Shayari) जो आपको ज़रूर पसंद आएंगी।
Allama Iqbal Shayari

तेरे इश्क़ की इन्तहा चाहता हूँ,
मेरी सादगी देख क्या चाहता हूँ,
भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी,
बड़ा बे-अदब हूँ, सज़ा चाहता हूँ..!

ये कफन, ये क़ब्र, ये जनाज़े रस्म ए
शरीयत है इकबाल मार तो इंसान तब
ही जाता है जब याद करने वाला कोई ना हो..!

मुझ सा कोई शख्स नादान भी न हो.
करे जो इश्क़ कहता है नुकसान भी न हो.

तिरे इश्क़ की “इंतिहा ” चाहता हूँ,
मिरी “सादगी” देख क्या चाहता हूँ,
ये जन्नत “मुबारक” रहे ज़ाहिदों को,
कि मैं आप का सामना चाहता हूँ.!

मकानी हूँ कि आज़ाद-ए-मकां हूँ,
जहां में हूँ कि खुद सारा जहां हूँ,
वो अपनी ला-मकानी में रहे मस्त,
मुझे इतना बता दें मैं कहां हूँ.
Allama Iqbal Shayari 2 Line
सब कुछ सिखा रक्खा है वाइज़ को,
ये हज़रत देखने में सीधे-सादे भोले-भाले हैं!
तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा
तिरे सामने आसमाँ और भी हैं…
सौ सौ उमीदें बंधती है इक इक निगाह पर ।।
मुझ को न ऐसे प्यार से देखा करे कोई।।
अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा था मैं,
आब ओ गिल के खेल को अपना जहाँ समझा था मैं!
दिल से जो बात निकलती है असर रखती है,
पर नहीं ताकृत-ए-परवाज़ मगर रखती है
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं,
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं!
कफ़न में लिपटी हुई उम्मीदें दफन हैं,
दो गज ज़मीं भी नहीं मिली वफ़ा के काबिल।
भरी बज्म में राज़ की बात कहु दी,
बड़ा बे-अदब हूँ सज़ा चाहता हूँ!
कभी हम से, कभी गैरों से शनासाई है,
बात कहने की नहीं, तू भी तो हरजाई है।
माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं,
तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख!
अल्लामा इक़बाल शायरी
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं,
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं,
तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ,
यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं!
ज़लाम-ए-बहर में खो कर सँभल जा,
तड़प जा पेच खा-खा कर बदल जा,
नहीं साहिल तिरी किस्मत में ऐ मौज,
उभर कर जिस तरफ चाहे निकल जा!
तेरी दुआ से कज़ा तो बदल नहीं सकती,
मगर है इस से यह मुमकिन की तू बदल जाये,
तेरी दुआ है की हो तेरी आरज़ू पूरी,
मेरी दुआ है तेरी आरज़ू बदल जाये !
तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ,
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ,
ये जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को,
कि मैं आप का सामना चाहता हूँ !
तिरे सीने में दम है दिल नहीं है,
तिरा दिल गर्मी-ए-महफ़िल नहीं है,
गुज़र जा अक्ल से आगे कि ये नूर,
चराग़-ए-राह है मंज़िल नहीं है!
अस्थिर है ये जिंदगी के लम्हे,
खो दे गया हूँ मैं अपनी ज़मीं पर,
उठ जाती हैं हर इक धड़कन के साथ,
मेरे अंदर बसा इश्क़ की रौशनी पर।
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं,
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं,
तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ यहाँ
सैकड़ों कारवाँ और भी हैं!
अमल से जिंदगी बनती है,
जन्नत भी जहन्नम भी, ये खाकी
अपनी फितरत में न नूरी है न नारी है.!
माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हूं मैं,
तू मेरा शौक देख मेरा इंतजार देख!
कुछ बातें अनकही रहने दो,
कुछ बातें अनसुनी रहने दो…!
Allama Iqbal Shayari in Hindi
जलाम-ए-बहर में खो कर सँभल जा,
तड़प जा पेच खा खा कर बदल जा,
नहीं साहिल तिरी किस्मत में ऐ मौज,
उभर कर जिस तरफ चाहे निकल जा.. ।
तिरे इश्क़ की “इंतिहा” चाहता हूँ,
मिरी “सादगी” देख क्या चाहता हूँ,
ये जन्नत “मुबारक” रहे ज़ाहिदों को
कि मैं आप का सामना चाहता हूँ।
जो किए ही नहीं कभी मैंने,
वो भी वादे निभा रहा हूँ मैं.
मुझसे फिर बात कर रही है वो,
फिर से बातों मे आ रहा हूँ मैं !
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं,
अभी इश्क़ के “इम्तिहाँ” और भी हैं,
तही “ज़िंदगी” से नहीं ये फ़ज़ाएँ,
यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं.!
दीप ऐसे बुझे फिर जले ही नहीं,
ज़ख्म इतने मिले फिर सिले भी नहीं,
व्यर्थ किस्मत पे रोने से क्या फायदा,
सोच लेना कि हम तुम मिले भी नहीं।
