Mirza Ghalib Shayari: उर्दू शायरी के सबसे महान शायरों में से एक माने जाते हैं। उनकी शायरी में प्यार, दर्द, जिंदगी और इंसानी भावनाओं की गहराई साफ झलकती है। ग़ालिब के अल्फाज़ आज भी लोगों के दिलों को छू जाते हैं और उन्हें सोचने पर मजबूर कर देते हैं।
Mirza Ghalib Shayari

ज़िन्दगी से हम अपनी कुछ उधार नही लेते,
कफ़न भी लेते है तो अपनी ज़िन्दगी देकर ।
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आखिर इस दर्द की दवा क्या है…..
गुनाह करके कहाँ जाओगे ग़ालिब
ये ज़मीं ये आसमाँ सब उसी का है!
कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग
हम को जीने की भी उम्मीद नहीं!
उन के देखे से जो आ जाती है
मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का
हाल अच्छा है!
कब वो सुनता है कहानी मेरी
और फिर वो भी ज़बानी मेरी!
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना!
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब ‘
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने!
Mirza Ghalib Shayari Love
इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के!
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही
मेरी वहशत तिरी शोहरत ही सही!
इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं!
आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए
साहब को दिल न देने पें कितना गुरूर था!
हुई मुद्दत कि ग़ालिब मर गया
पर याद आता है
वो हर इक बात पर कहना कि
यूँ होता तो क्या होता!
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर
ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान
लेकिन फिर भी कम निकले!
हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती!
रोने से और इश्क़ में बे-बाक हो गए
धोए गए हम इतने कि बस पाक हो गए!
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है!
मेहरबाँ हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त
मैं गया वक़्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूँ!
मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी हिंदी में
ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के!
मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यूँ रात भर नहीं आती!
मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती!
मैं ने चाहा था कि अंदोह-ए-वफ़ा से छूटूं
वो सितमगर मिरे मरने पे भी राज़ी न हुआ!
फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं
फिर वही ज़िंदगी हमारी है!
बुलबुल के कारोबार पे हैं खंदा-हा-ए-गुल
कहते हैं जिस को इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का!
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना!
निकल्ना खुल्द से आदम क
सुनते आए हैं
लेकिन बहुत बे-आबरू हो
कर तिरे कूचे से हम निकले
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है!
वो आए घर में हमारे ख़ुदा की कुदरत है
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते है!
Mirza Ghalib Shayari in Hindi
करने गए थे उनसे तग़ाफुल का हम गिला,
की एक ही निगाह कि हम ख़ाक हो गए।
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर
ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान
लेकिन फिर भी कम निकले!
उन के देखे से जो आ जाती है
मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का
हाल अच्छा है!
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है!
हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी खबर नहीं आती!
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है!
कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता!
गुनाह करके कहाँ जाओगे ग़ालिब
ये ज़मी ये आसमां सब उसी का है!
तुम न आए तो क्या सहर न हुई
हाँ मगर चैन से बसर न हुई
मेरा नाला सुना ज़माने ने
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई!
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है…
Mirza Ghalib Shayari Mohabbat
इश्क़ पर जोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’,
कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे!
तू मिला है तो ये अहसास हुआ है मुझको
ये मेरी उम्र मोहब्बत के लिए थोड़ी है!
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने
और मरने का,
उसी को देख कर जीते हैं
जिस काफ़िर पे दम निकले ।।
यही है आज़माना तो सताना
किसको कहते हैं,
अदू के हो लिए जब तुम
तो मेरा इम्तहां क्यों हो…
न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता
तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता
मैं तो क्या होता!
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता
इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के!
रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गए
धोए गए हम इतने कि बस पाक हो गए!
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना!
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
